मुद्दा ले लो भैय्या, थोक के भाव
अभी दो दिन से जो इस देश
में सबसे गरमाया हुआ मुद्दा है वो ये कि NDTV पर लगा बैन सही है या गलत | जो लोग ज्यादा
देशभक्त है और राष्ट्रवादी है उनके अनुसार NDTV पर लगा बैन गलत है क्योंकि वो एक दिन का है, उनके अनुसार NDTV जैसे देशद्रोही चैनल पर तो
हमेशा के लिए ही बैन लगा देने चाहिए | और कुछ लोग है जो इसे गलत बताते है,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते है | ऐसी ही बातों से फेसबुक, ट्विटर,
व्हाट्स एप्प भरे पड़े है | जब से श्रीमान देशभक्त नरेन्द्र मोदी जी भारत के
प्रधानमन्त्री बने है एक फायदा ब्लॉग लिखने वालों, पत्रकारों और साहित्यकारों को
हुआ है | अब आपको मुद्दे सोचने नहीं पड़ते कभी आपके पास अवार्ड वापसी का मुद्दा,
असहिष्णुता का मुद्दा, गोमांस का मुद्दा, लकड़ी की चाभी आदि आदि बहुत सारे मुद्दे
मिलते है | लोगों को बताना चाहूँगा कि यहाँ पर आदि का मतलब अदरक नहीं इत्यादि है |
लेकिन इन सारे मुद्दों में पिछले तीन – साढ़े तीन साल से वो मुद्दे भटक चुके है
जिनके बारे में हमें ज्यादा बातें करनी चाहिए | रोज़गार की, भ्रष्टाचार की, महिला
अधिकार की लेकिन ये सारे मुद्दे दब चुके है | इन पर अगर आप बात भी करें तो लगता है
कि कितने ज़मानो पीछे आप चले गए है | अगर आप हाई-टेक वक्ता है तो आपको देशद्रोह और
राष्ट्रवाद की बातें ही करनी पड़ती है | जनता को भी इसी मे आनंद आता है | जब आप थके
हारे ऑफिस से घर वापस आते है और जब टेलीविज़न खोल के न्यूज़ चैनल लगते है तो आप इसी
उम्मीद में होते है कि काश कोई तडकता भड़कता सा डिबेट मिल जाये जिसमे पनेलिस्ट आपस
में मार-पिट, तू तू-मैं मैं, उठा-पटक करे | अगर आपको ये सारा मसाला नहीं मिल पाता
है तो लगता है कि शाम बर्बाद हो गयी | मीडिया भी उन्ही मुद्दों के बारे में बात और
डिबेट करते है जिससे जनता को कोई फायेदा हो या ना हो लेकिन उनकी TRP छप्पर फाड़ हो | TRP बढाने के लिए तो कुछ न्यूज़
एंकर जब “ today’s burning question” कहते है तो ग्राफ़िक्स में आग भी जलने लगती है | और जब कुछ एंकर
चीखते है, चिल्लाते है और आठ दस की जमात में बैठ कर बकैती करते है, सवाल खुद पूछते
है और उसका जवाब भी खुद देते है, दस बार Never- ever का नारा लगाते है और पब्लिक
सोचती है क्या बात है ! क्या एंकर है 1 घंटे पूरा एंटरटेन करता है | उसी जगह अगर
कोई एंकर शांत दिमाग से बात करता है, जनता के अधिकारों की बात करता है, जब वो सवाल
उठाता है तब वो एक बोरिंग एंकर बन जाता है, क्योंकि जनता को उस डिबेट में मसाला
नहीं मिल पता है | आज आप यानी जनता उन मुद्दों पर नहीं सोच रही है जो विचारनीय है | आप फौजियों की बहुत इज्ज़त करते है, करनी भी चाहिए क्योंकि वो देश की सुरक्षा करते है, लेकिन जब फौजियों के मेडल खींचे गए, उनकी वर्दियां फाड़ी गयी जब वो OROP के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे | उस वक़्त भी ये मुद्दा नहीं उठाया गया क्योंकि इससे किसी का भी राजनैतिक फ़ायदा नहीं था | आज नजीब लापता है, जो JNU का छात्र आज उसे लापता हुए लगभग 18 दिन हो चुके है पुलिस ने उसे ढूँढा नही है, लेकिन आपके जेल से लकड़ी की चाभी से ताला तोड़ कर तथाकथित आतंकवादी फरार होते है तब उन 8 आतंकवादी को मात्र 8 घंटे में ढूंढ कर एनकाउंटर कर दिया जाता है | क्या यही अच्छे दिन है ? अच्छे दिन से याद आया कि ये एक चुनावी जुमला था इसीलिए आप इसे ज्यादा तवज्जो ना दे | ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ये खुद अमित शाह का बयान है | इन सारी चीख चिल्लाहट में आपके मुद्दे जिनमे आपके हितों की बात होती है वो दब जाती है | ये आपकी जवाबदेही है कि जब आप टेलीविज़न के सामने बैठे और आपके सामने बैठा एंकर चिल्लाये और आपके मुद्दे दबे तब आप उठे बालकनी में निकले ताज़ी हवा का एहसास ले और सोचने की कोशिश करे |



