Thursday, 20 October 2016


क्या आपने किन्नरों का करवाचौथ देखा है ?
आज सुबह जब कई लोगों ने अखबार खोले होंगे और करवाचौथ की कई ख़बरें पढ़ी होगी | कई राजनेताओं की मोहतरमा की तस्वीरें भी छपी है करवाचौथ करते हुए | लेकिन इन ख़बरों में आपने किन्नरों का करवाचौथ की खबर देखि या सुनी है ? कई लोगों को ये सुन कर अचम्भा लगेगा कि किन्नर करवाचौथ भी करती है ? तो आप लोगों की जानकारी के लिए, जी हाँ, किन्नर भी करवाचौथ करती है और कई किन्नर या किन्नरी शादीशुदा भी होती है | लेकिन जब रेशमा जी, जो किन्नरों का एक संगठन दोस्ताना सफ़र पटना में चलाती है, उनका फ़ोन आया की उनकी कई किन्नर मित्र करवाचौथ कर रही है, अगर आप उनके कुछ फुटेज लेना चाहे तो आ जाइये | और मैं अपने दोस्त के साथ दोस्ताना सफ़र के ऑफिस के तरफ चल पड़ा | करवाचौथ के अवसर पे पटना की सारी किन्नर और किन्नरी वहां जमा थे | हालाँकि व्रत सिर्फ २ लोगों ने ही रखा था लेकिन सारे लोगों का उत्साह देखने लायक था | इसी बहाने किन्नर समुदाय के साथ पहली बार मैंने काफी ज्यादा वक्त बिताया और इतने करीब से उनके जीवन को देखा | कई किन्नर उसमे शादी शुदा भी थी | अलग अलग दफ्तरों में काम करने वाली, कोचिंग इंस्टिट्यूट चलने वाली, पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक कर रही किन्नरों से कल मुलाकात हुई | जितना समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर रखा है वो लोग वैसे है ही नहीं, वो हम से अलग नहीं हम लोगों ने उन्हें अपने से अलग कर रखा है | जब मेरी बात कल उन लोगों से हुई तो कई ऐसी बातें सामने आई जिसने उन सारे मिथ्यायों को तोड़ दिया जो आज तक मेरे कान में समाज के द्वारा भरे गए थे | जब मैंने ये तय किया कि मैं उन लोगों पर एक न्यूज़ स्टोरी करूँगा तो कई लोगों ने कहा कि संभल के रहना कही तुम्हे भी वो लोग अपने तरह ना बना दे | आये दिन किन्नरों को इससे भी ख़राब बातों का सामना करना पड़ता है | जब कोई किन्नर ऑटो में बैठती है तो उसके बगल में बैठने वाले लोग उतर जाते है | या जब वो बसों में आरक्षित महिलाओं के सीट पर बैठती है तो कई बार महिलाएं ही उन्हें उठा देती है कि ये महिलाओं की सीट है हिजड़ो की नहीं | लेकिन इस मामले को लेकर बिहार में किन्नरों ने लड़ाई लड़ी और अपने लिए राज्य सरकार से आरक्षित बस सीटों का इंतज़ाम करवाया | जब वो अपने कॉलेज जाते है पढाई करने तो उनका कोई दोस्त नहीं बनता, उनके पास कोई बैठना नहीं चाहता, उन्हें लोग ताली बजा के चिढाते है | यही कारण है कि कई ऐसे किन्नर भी है जो अपनी आइडेंटिटी को छुपा कर रखते है | इससे ख़राब बात क्या होगी कि हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि कोई इंसान अपनी पहचान से इतना शर्मिंदा है कि वो अपने पहचान को छिपा कर रखता है | अगर आप लोगों ने ध्यान दिया होगा तो बड़े बड़े दफ्तरों के पदों पर जब नौकरी के आवेदन निकलते है तो उसमे सेक्स यानी लिंग में सिर्फ महिला या पुरुष ही रहते है | सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया है कि सारे फॉर्म्स में तीसरे लिंग का भी खाना रहे | लेकिन सरकारी फॉर्म्स में भी तीसरे लिंग का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है | जब आप रेल टिकट का आवेदन पत्र देखेंगे तो उसमे भी महिला या पुरुष का ही खाना रहता है | तो क्या ये माना जाये कि सरकार भी उन्हें इंसान या अपने सिटीजन के तौर पर नहीं मानती है ?

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