ऐ नबी, अपनी पत्नियों और बेटियों और इमान्वालों की औरतों से कह दो कि अपने ऊपर चादरों से पल्लू लटका लिया करे | यह ज्यादा उचित तरीका है ताकि वोह पहचान लिए जाये और सताई ना जाए |( सूरा अल-अहज़ाब,आयत 59)
ऐ आदम की संतान, हमने तुम पर लिबास उतारा है कि तुम्हारे शारीर के गुप्तांग ढंके और तुम्हारे लिए शरीर की रक्षा और सौन्दर्य की साधना भी हो और बेहतरीन वस्त्र परहेज़गारी का वस्त्र है |(सूरा अल-आरफ, आयत 26)
इस तरह की और भी कई आयतें है जो औरतों के कपड़ों के बारे में बताती है लेकिन अगर इन आयातों को ध्यान से पढ़ कर समझने का प्रयास किया जाए तो आपको इन में हिजाब या बुरका, नकाब जैसी किसी भी चीज़ का ब्यान नहीं मिलता है | कुरआन में कुल सात बार 'हिजाब' या 'हिजाबन' शब्द का प्रयोग हुआ है | इन में से पांच बार हिजाब का और दो बार हिजाबन का प्रयोग मिलता है, वो सूरा और आयतें है - 7:46, 33:53, 38:32, 41:5, 42:51, 17:45 और 19:17 | लेकिन इन सारे जगहों में हिजाब या हिजाबन शब्द का इस्तेमाल आज के हिजाब, जो औरतें पहनती है, उस के बारे में नहीं बताता है | इन सारे जगहों में हिजाब का मतलब एक प्रतिबंधित वास्तु या बैरियर के तौर पर इस्तेमाल हुआ है | लेकिन इस्लाम का जो मॉडर्न वर्शन हमारे सामने है उसमे ईमान वाली मोमिना के लिया हिजाब बहुत महत्वपूर्ण है | जिस प्रकार का हिजाब हिन्दुस्तानी मुस्लिम महिलाओं ने धारण कर रखा है ठीक उसी प्रकार का हिजाब 'तुअरेग' जाति जो सहारा रेगिस्तान के इलाकों में पायी जाती है वहां के मुस्लिम मर्द पहनते है और वहां की ज़्यादातर औरतें सर पर आँचल रखती है | कुरआन में जो सबसे पहला नियम औरतों के लिबास के सन्दर्भ में आया है वो सूरा अल-आरफ, आयत 26 में | जिसमे साफ़ तौर पर ये कहा गया है इस तरह का लिबास पहनो जिससे तुम्हारे शरीर की रक्षा हो और सौन्दर्य की साधना हो, इस आयत में कहीं से बुरका या हिजाब, जो आज की महिलाए पहनती है, का ज़िक्र कहीं से नहीं मिलता है | तब प्रश्न ये उठता है कि इस बुर्के या हिजाब का पहनावा आया कहाँ से ? इस्लाम के शुरुआत से पहले से अरब की औरतें हिजाब अपने इस्तेमाल में लाया करती थी और साथ ही इस्लाम से पहले के कुछ धर्म जैसे ईसाई या यहूदी धर्म की औरत अपने पहनावे में हिजाब रखती थी | सूरा अल-अहज़ाब में के आयत 53 में खुदा ने कहा कि 'ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, नबी की पत्नियों से अगर तुम्हे कुछ माँगना हो तो परदे के पीछे रह के मांगो |' इस आयत में कहीं से भी महिलाओं को परदे में रहने को नहीं कहा गया है, लेकिन आज के समाज में जहाँ लोग औरतों को परदे में या हिजाब, बुर्के के जंजीरों में जकड के रखना चाहते है उन्हें एक बार कुरआन क फिर से पढना चाहिए | कोई भी महिला हिजाब पहनना चाहती है नहीं ये उसकी व्यक्तिगत आज़ादी होनी चाहिए ना समाज कि थोपी हुई | मुझे ना तो हिजाब से परहेज़ है नाही बुर्के पर आपत्ति , लेकिन अगर ये सारी चीजें महिलाओं के प्रगति में रोड़ा बनती है तो सारे मुस्लिम समुदाय को हिजाब पर फिर सोचना चाहिए |


