Saturday, 22 October 2016


           हिजाब और औरत - कुरान के नज़र में
ऐ नबी, अपनी पत्नियों और बेटियों और इमान्वालों की औरतों से कह दो कि अपने ऊपर चादरों से पल्लू लटका लिया करे | यह ज्यादा उचित तरीका है ताकि वोह पहचान लिए जाये और सताई ना जाए |( सूरा अल-अहज़ाब,आयत 59)

ऐ आदम की संतान, हमने तुम पर लिबास उतारा है कि तुम्हारे शारीर के गुप्तांग ढंके और तुम्हारे लिए शरीर की रक्षा और सौन्दर्य की साधना भी हो और बेहतरीन वस्त्र परहेज़गारी का वस्त्र है |(सूरा अल-आरफ, आयत 26)

 इस तरह की और भी कई आयतें है जो औरतों के कपड़ों के बारे में बताती है लेकिन अगर इन आयातों को ध्यान से पढ़ कर समझने का प्रयास किया जाए तो आपको इन में हिजाब या बुरका, नकाब जैसी किसी भी चीज़ का ब्यान नहीं मिलता है | कुरआन में कुल सात बार 'हिजाब' या 'हिजाबन' शब्द का प्रयोग हुआ है | इन में से पांच बार हिजाब का और दो बार हिजाबन का प्रयोग मिलता है, वो सूरा और आयतें है - 7:46, 33:53, 38:32, 41:5, 42:51, 17:45 और 19:17 | लेकिन इन सारे जगहों में हिजाब या हिजाबन शब्द का इस्तेमाल आज के हिजाब, जो औरतें पहनती है, उस के बारे में नहीं बताता है | इन सारे जगहों में हिजाब का मतलब एक प्रतिबंधित वास्तु या बैरियर के तौर पर इस्तेमाल हुआ है | लेकिन इस्लाम का जो मॉडर्न वर्शन हमारे सामने है उसमे ईमान वाली मोमिना के लिया हिजाब बहुत महत्वपूर्ण है | जिस प्रकार का हिजाब हिन्दुस्तानी मुस्लिम महिलाओं ने धारण कर रखा है ठीक उसी प्रकार का हिजाब 'तुअरेग' जाति जो सहारा रेगिस्तान के इलाकों में पायी जाती है वहां के मुस्लिम मर्द पहनते है और वहां की ज़्यादातर औरतें सर पर आँचल रखती है | कुरआन में जो सबसे पहला नियम औरतों के लिबास के सन्दर्भ में आया है वो सूरा अल-आरफ, आयत 26 में | जिसमे साफ़ तौर पर ये कहा गया है इस तरह का लिबास पहनो जिससे तुम्हारे शरीर की रक्षा हो और सौन्दर्य की साधना हो, इस आयत में कहीं से बुरका या हिजाब, जो आज की महिलाए पहनती है, का ज़िक्र कहीं से नहीं मिलता है | तब प्रश्न ये उठता है कि इस बुर्के या हिजाब का पहनावा आया कहाँ से ? इस्लाम के शुरुआत से पहले से अरब की औरतें हिजाब अपने इस्तेमाल में लाया करती थी और साथ ही इस्लाम से पहले के कुछ धर्म जैसे ईसाई या यहूदी धर्म की औरत अपने पहनावे में हिजाब रखती थी | सूरा अल-अहज़ाब में के आयत 53 में खुदा ने कहा कि 'ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, नबी की पत्नियों से अगर तुम्हे कुछ माँगना हो तो परदे के पीछे रह के मांगो |' इस आयत में कहीं से भी महिलाओं को परदे में रहने को नहीं कहा गया है, लेकिन आज के समाज में जहाँ लोग औरतों को परदे में या हिजाब, बुर्के के जंजीरों में जकड के रखना चाहते है उन्हें एक बार कुरआन क फिर से पढना चाहिए | कोई भी महिला हिजाब पहनना चाहती है नहीं ये उसकी व्यक्तिगत आज़ादी होनी चाहिए ना समाज कि थोपी हुई | मुझे ना तो हिजाब से परहेज़ है नाही बुर्के पर आपत्ति , लेकिन अगर ये सारी चीजें महिलाओं के प्रगति में रोड़ा बनती है तो सारे मुस्लिम समुदाय को हिजाब पर फिर सोचना चाहिए |

Thursday, 20 October 2016


क्या आपने किन्नरों का करवाचौथ देखा है ?
आज सुबह जब कई लोगों ने अखबार खोले होंगे और करवाचौथ की कई ख़बरें पढ़ी होगी | कई राजनेताओं की मोहतरमा की तस्वीरें भी छपी है करवाचौथ करते हुए | लेकिन इन ख़बरों में आपने किन्नरों का करवाचौथ की खबर देखि या सुनी है ? कई लोगों को ये सुन कर अचम्भा लगेगा कि किन्नर करवाचौथ भी करती है ? तो आप लोगों की जानकारी के लिए, जी हाँ, किन्नर भी करवाचौथ करती है और कई किन्नर या किन्नरी शादीशुदा भी होती है | लेकिन जब रेशमा जी, जो किन्नरों का एक संगठन दोस्ताना सफ़र पटना में चलाती है, उनका फ़ोन आया की उनकी कई किन्नर मित्र करवाचौथ कर रही है, अगर आप उनके कुछ फुटेज लेना चाहे तो आ जाइये | और मैं अपने दोस्त के साथ दोस्ताना सफ़र के ऑफिस के तरफ चल पड़ा | करवाचौथ के अवसर पे पटना की सारी किन्नर और किन्नरी वहां जमा थे | हालाँकि व्रत सिर्फ २ लोगों ने ही रखा था लेकिन सारे लोगों का उत्साह देखने लायक था | इसी बहाने किन्नर समुदाय के साथ पहली बार मैंने काफी ज्यादा वक्त बिताया और इतने करीब से उनके जीवन को देखा | कई किन्नर उसमे शादी शुदा भी थी | अलग अलग दफ्तरों में काम करने वाली, कोचिंग इंस्टिट्यूट चलने वाली, पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक कर रही किन्नरों से कल मुलाकात हुई | जितना समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर रखा है वो लोग वैसे है ही नहीं, वो हम से अलग नहीं हम लोगों ने उन्हें अपने से अलग कर रखा है | जब मेरी बात कल उन लोगों से हुई तो कई ऐसी बातें सामने आई जिसने उन सारे मिथ्यायों को तोड़ दिया जो आज तक मेरे कान में समाज के द्वारा भरे गए थे | जब मैंने ये तय किया कि मैं उन लोगों पर एक न्यूज़ स्टोरी करूँगा तो कई लोगों ने कहा कि संभल के रहना कही तुम्हे भी वो लोग अपने तरह ना बना दे | आये दिन किन्नरों को इससे भी ख़राब बातों का सामना करना पड़ता है | जब कोई किन्नर ऑटो में बैठती है तो उसके बगल में बैठने वाले लोग उतर जाते है | या जब वो बसों में आरक्षित महिलाओं के सीट पर बैठती है तो कई बार महिलाएं ही उन्हें उठा देती है कि ये महिलाओं की सीट है हिजड़ो की नहीं | लेकिन इस मामले को लेकर बिहार में किन्नरों ने लड़ाई लड़ी और अपने लिए राज्य सरकार से आरक्षित बस सीटों का इंतज़ाम करवाया | जब वो अपने कॉलेज जाते है पढाई करने तो उनका कोई दोस्त नहीं बनता, उनके पास कोई बैठना नहीं चाहता, उन्हें लोग ताली बजा के चिढाते है | यही कारण है कि कई ऐसे किन्नर भी है जो अपनी आइडेंटिटी को छुपा कर रखते है | इससे ख़राब बात क्या होगी कि हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि कोई इंसान अपनी पहचान से इतना शर्मिंदा है कि वो अपने पहचान को छिपा कर रखता है | अगर आप लोगों ने ध्यान दिया होगा तो बड़े बड़े दफ्तरों के पदों पर जब नौकरी के आवेदन निकलते है तो उसमे सेक्स यानी लिंग में सिर्फ महिला या पुरुष ही रहते है | सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया है कि सारे फॉर्म्स में तीसरे लिंग का भी खाना रहे | लेकिन सरकारी फॉर्म्स में भी तीसरे लिंग का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है | जब आप रेल टिकट का आवेदन पत्र देखेंगे तो उसमे भी महिला या पुरुष का ही खाना रहता है | तो क्या ये माना जाये कि सरकार भी उन्हें इंसान या अपने सिटीजन के तौर पर नहीं मानती है ?

Friday, 7 October 2016


क्या दलित और अल्पसंख्यक आतंकवादी होते है ?
आये दिन ख़बरों में किसी ना किसी आतंकवादी या शक के बिनाह पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों का नाम छपता है | उन लोगों का नाम पढने के बाद एक ही सवाल मन में आता है , क्या सिर्फ दलित और अल्पसंख्यक ही आतंकवादी होते है ? या जो लोग दलित और अल्पसंख्यक होते है उन्ही पर आतंकवादी होने का शक किया जाता है | आज मेरी मुलाकत तारिक अनवर से हुई जो पटना यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता का छात्र है और साथ ही AISA का विश्वविद्यालय अध्यक्ष भी | तारिक भाई के साथ तीन और लोग जिनमे से दो से मेरी मुलाकात हुई है उनके नाम है आज़ाद चाँद और गौतम , ये दोनों भी जन अधिकार पार्टी के सदस्य है | ये चारों छात्र अल्पसंख्यक और दलित समुदाय से आते है और चारों को विश्विद्यालय प्रशासन ने निष्कासित किया है क्योंकि विश्विद्यालय को ये "शक" है कि ये छात्र आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है |इन चारों छात्रों को गुनाह सिर्फ ये था की उन्होंने अपने डिपार्टमेंट में हो रहे जातिगत दुर्वयवहार के खिलाफ आवाज़ उठाई और देखते ही देखते ये मुद्दा एक बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया | इस आन्दोलन में कई और छात्र हितों के मुद्दे जुड़े हुए थे , इस आन्दोलन से नाराज़ हिंदी और पत्रकारिता विभाग के हेड प्रोफेसर मटुक नाथ ने पटना विश्विद्यालय के कुलपति को चिट्ठी लिखी और इन छात्रों को सस्पेंड करने की मांग की साथ ही साथ ये भी लिखा की इन छात्रों से मेरी जान को खतरा है | इसके जवाब में विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन चार छात्रों को निष्कासित कर दिया | मज़े की बात ये है की विश्वविद्यालय को भी दलित और अल्पसंख्यक छात्रों से ही ज्यादा परेशानी और खतरा लगा | सिर्फ यही नहीं कई ऐसे केस है जिनमे लोगों को सिर्फ दलित और अल्पसंख्यक होने के कारण आतंकवादी का दंश झेलना पड़ रहा है | लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के आरोपी आज भी आज़ाद हवा में सांस ले रहे है , उनपर न सरकार की सख्ती दिखाई दी नाही पुलिस की | सिर्फ इस लिए कि वो दलित नहीं थे | सबसे अफ़सोस तब होता है जब देश के एक नामी संस्था जो काफी प्रगतिशील विचारधारा के है उसके एक सदस्य ने पूछा की "आमिर तुमको क्या लगता है की पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करना चाहिए ?" मेरा जवाब था "करने से पहले अच्छे से विचार करना चाहिए क्योंकि आतंकवादी देश घोषित करने के बाद वहां की आम जनता पर काफी दुष्प्रभाव पड़ेगा, उस जनता पर जो आतंकवादी नहीं है |" तब उस आदमी ने जवाब दिया "भाई अब आप पर भी पैनी नज़र रखनी पड़ेगी |" आज पुरे देश में धर्म को लेकर लोगों पर आतंकवाद से संबंध होने का शक किया जाता है , पर अब लोगों को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए | आज कई ऐसे लोग है जो अल्पसंख्यक या दलित समुदाय से आते हैं और उनके वजह से हिन्दुस्तान का नाम अलग अलग क्षेत्रों में बढ़ा है है | दलितों पर ऊँगली उठाने वालों को ये हमेशा याद रखना चाहिए कि इस देश का संविधान, जिस पर पूरा देश टिका हुआ है, वो भी एक दलित ने ही लिखा था | |