Sunday, 6 November 2016

                         मुद्दा ले लो भैय्या, थोक के भाव


अभी दो दिन से जो इस देश में सबसे गरमाया हुआ मुद्दा है वो ये कि NDTV पर लगा बैन सही है या गलत | जो लोग ज्यादा देशभक्त है और राष्ट्रवादी है उनके अनुसार NDTV  पर लगा बैन गलत है क्योंकि वो एक दिन का है, उनके अनुसार NDTV जैसे देशद्रोही चैनल पर तो हमेशा के लिए ही बैन लगा देने चाहिए | और कुछ लोग है जो इसे गलत बताते है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते है | ऐसी ही बातों से फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप्प भरे पड़े है | जब से श्रीमान देशभक्त नरेन्द्र मोदी जी भारत के प्रधानमन्त्री बने है एक फायदा ब्लॉग लिखने वालों, पत्रकारों और साहित्यकारों को हुआ है | अब आपको मुद्दे सोचने नहीं पड़ते कभी आपके पास अवार्ड वापसी का मुद्दा, असहिष्णुता का मुद्दा, गोमांस का मुद्दा, लकड़ी की चाभी आदि आदि बहुत सारे मुद्दे मिलते है | लोगों को बताना चाहूँगा कि यहाँ पर आदि का मतलब अदरक नहीं इत्यादि है | लेकिन इन सारे मुद्दों में पिछले तीन – साढ़े तीन साल से वो मुद्दे भटक चुके है जिनके बारे में हमें ज्यादा बातें करनी चाहिए | रोज़गार की, भ्रष्टाचार की, महिला अधिकार की लेकिन ये सारे मुद्दे दब चुके है | इन पर अगर आप बात भी करें तो लगता है कि कितने ज़मानो पीछे आप चले गए है | अगर आप हाई-टेक वक्ता है तो आपको देशद्रोह और राष्ट्रवाद की बातें ही करनी पड़ती है | जनता को भी इसी मे आनंद आता है | जब आप थके हारे ऑफिस से घर वापस आते है और जब टेलीविज़न खोल के न्यूज़ चैनल लगते है तो आप इसी उम्मीद में होते है कि काश कोई तडकता भड़कता सा डिबेट मिल जाये जिसमे पनेलिस्ट आपस में मार-पिट, तू तू-मैं मैं, उठा-पटक करे | अगर आपको ये सारा मसाला नहीं मिल पाता है तो लगता है कि शाम बर्बाद हो गयी | मीडिया भी उन्ही मुद्दों के बारे में बात और डिबेट करते है जिससे जनता को कोई फायेदा हो या ना हो लेकिन उनकी TRP छप्पर फाड़ हो | TRP बढाने के लिए तो कुछ न्यूज़ एंकर जब “ today’s burning question” कहते है तो ग्राफ़िक्स में आग भी जलने लगती है | और जब कुछ एंकर चीखते है, चिल्लाते है और आठ दस की जमात में बैठ कर बकैती करते है, सवाल खुद पूछते है और उसका जवाब भी खुद देते है, दस बार Never- ever का नारा लगाते है और पब्लिक सोचती है क्या बात है ! क्या एंकर है 1 घंटे पूरा एंटरटेन करता है | उसी जगह अगर कोई एंकर शांत दिमाग से बात करता है, जनता के अधिकारों की बात करता है, जब वो सवाल उठाता है तब वो एक बोरिंग एंकर बन जाता है, क्योंकि जनता को उस डिबेट में मसाला नहीं मिल पता है | आज आप यानी जनता उन मुद्दों पर नहीं सोच रही है जो विचारनीय है | आप फौजियों की बहुत इज्ज़त करते है, करनी भी चाहिए क्योंकि वो देश की सुरक्षा करते है, लेकिन जब फौजियों के मेडल खींचे गए, उनकी वर्दियां फाड़ी गयी जब वो OROP के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे | उस वक़्त भी ये मुद्दा नहीं उठाया गया क्योंकि इससे किसी का भी राजनैतिक फ़ायदा नहीं था | आज नजीब लापता है, जो JNU का छात्र आज उसे लापता हुए लगभग 18 दिन हो चुके है पुलिस ने उसे ढूँढा नही है, लेकिन आपके जेल से लकड़ी की चाभी से ताला तोड़ कर तथाकथित आतंकवादी फरार होते है तब उन 8 आतंकवादी को मात्र 8 घंटे में ढूंढ कर एनकाउंटर कर दिया जाता है | क्या यही अच्छे दिन है ? अच्छे दिन से याद आया कि ये एक चुनावी जुमला था इसीलिए आप इसे ज्यादा तवज्जो ना दे | ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ये खुद अमित शाह का बयान है | इन सारी चीख चिल्लाहट में आपके मुद्दे जिनमे आपके हितों की बात होती है वो दब जाती है | ये आपकी जवाबदेही है कि जब आप टेलीविज़न के सामने बैठे और आपके सामने बैठा एंकर चिल्लाये और आपके मुद्दे दबे तब आप उठे बालकनी में निकले ताज़ी हवा का एहसास ले और सोचने की कोशिश करे |

Saturday, 22 October 2016


           हिजाब और औरत - कुरान के नज़र में
ऐ नबी, अपनी पत्नियों और बेटियों और इमान्वालों की औरतों से कह दो कि अपने ऊपर चादरों से पल्लू लटका लिया करे | यह ज्यादा उचित तरीका है ताकि वोह पहचान लिए जाये और सताई ना जाए |( सूरा अल-अहज़ाब,आयत 59)

ऐ आदम की संतान, हमने तुम पर लिबास उतारा है कि तुम्हारे शारीर के गुप्तांग ढंके और तुम्हारे लिए शरीर की रक्षा और सौन्दर्य की साधना भी हो और बेहतरीन वस्त्र परहेज़गारी का वस्त्र है |(सूरा अल-आरफ, आयत 26)

 इस तरह की और भी कई आयतें है जो औरतों के कपड़ों के बारे में बताती है लेकिन अगर इन आयातों को ध्यान से पढ़ कर समझने का प्रयास किया जाए तो आपको इन में हिजाब या बुरका, नकाब जैसी किसी भी चीज़ का ब्यान नहीं मिलता है | कुरआन में कुल सात बार 'हिजाब' या 'हिजाबन' शब्द का प्रयोग हुआ है | इन में से पांच बार हिजाब का और दो बार हिजाबन का प्रयोग मिलता है, वो सूरा और आयतें है - 7:46, 33:53, 38:32, 41:5, 42:51, 17:45 और 19:17 | लेकिन इन सारे जगहों में हिजाब या हिजाबन शब्द का इस्तेमाल आज के हिजाब, जो औरतें पहनती है, उस के बारे में नहीं बताता है | इन सारे जगहों में हिजाब का मतलब एक प्रतिबंधित वास्तु या बैरियर के तौर पर इस्तेमाल हुआ है | लेकिन इस्लाम का जो मॉडर्न वर्शन हमारे सामने है उसमे ईमान वाली मोमिना के लिया हिजाब बहुत महत्वपूर्ण है | जिस प्रकार का हिजाब हिन्दुस्तानी मुस्लिम महिलाओं ने धारण कर रखा है ठीक उसी प्रकार का हिजाब 'तुअरेग' जाति जो सहारा रेगिस्तान के इलाकों में पायी जाती है वहां के मुस्लिम मर्द पहनते है और वहां की ज़्यादातर औरतें सर पर आँचल रखती है | कुरआन में जो सबसे पहला नियम औरतों के लिबास के सन्दर्भ में आया है वो सूरा अल-आरफ, आयत 26 में | जिसमे साफ़ तौर पर ये कहा गया है इस तरह का लिबास पहनो जिससे तुम्हारे शरीर की रक्षा हो और सौन्दर्य की साधना हो, इस आयत में कहीं से बुरका या हिजाब, जो आज की महिलाए पहनती है, का ज़िक्र कहीं से नहीं मिलता है | तब प्रश्न ये उठता है कि इस बुर्के या हिजाब का पहनावा आया कहाँ से ? इस्लाम के शुरुआत से पहले से अरब की औरतें हिजाब अपने इस्तेमाल में लाया करती थी और साथ ही इस्लाम से पहले के कुछ धर्म जैसे ईसाई या यहूदी धर्म की औरत अपने पहनावे में हिजाब रखती थी | सूरा अल-अहज़ाब में के आयत 53 में खुदा ने कहा कि 'ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, नबी की पत्नियों से अगर तुम्हे कुछ माँगना हो तो परदे के पीछे रह के मांगो |' इस आयत में कहीं से भी महिलाओं को परदे में रहने को नहीं कहा गया है, लेकिन आज के समाज में जहाँ लोग औरतों को परदे में या हिजाब, बुर्के के जंजीरों में जकड के रखना चाहते है उन्हें एक बार कुरआन क फिर से पढना चाहिए | कोई भी महिला हिजाब पहनना चाहती है नहीं ये उसकी व्यक्तिगत आज़ादी होनी चाहिए ना समाज कि थोपी हुई | मुझे ना तो हिजाब से परहेज़ है नाही बुर्के पर आपत्ति , लेकिन अगर ये सारी चीजें महिलाओं के प्रगति में रोड़ा बनती है तो सारे मुस्लिम समुदाय को हिजाब पर फिर सोचना चाहिए |

Thursday, 20 October 2016


क्या आपने किन्नरों का करवाचौथ देखा है ?
आज सुबह जब कई लोगों ने अखबार खोले होंगे और करवाचौथ की कई ख़बरें पढ़ी होगी | कई राजनेताओं की मोहतरमा की तस्वीरें भी छपी है करवाचौथ करते हुए | लेकिन इन ख़बरों में आपने किन्नरों का करवाचौथ की खबर देखि या सुनी है ? कई लोगों को ये सुन कर अचम्भा लगेगा कि किन्नर करवाचौथ भी करती है ? तो आप लोगों की जानकारी के लिए, जी हाँ, किन्नर भी करवाचौथ करती है और कई किन्नर या किन्नरी शादीशुदा भी होती है | लेकिन जब रेशमा जी, जो किन्नरों का एक संगठन दोस्ताना सफ़र पटना में चलाती है, उनका फ़ोन आया की उनकी कई किन्नर मित्र करवाचौथ कर रही है, अगर आप उनके कुछ फुटेज लेना चाहे तो आ जाइये | और मैं अपने दोस्त के साथ दोस्ताना सफ़र के ऑफिस के तरफ चल पड़ा | करवाचौथ के अवसर पे पटना की सारी किन्नर और किन्नरी वहां जमा थे | हालाँकि व्रत सिर्फ २ लोगों ने ही रखा था लेकिन सारे लोगों का उत्साह देखने लायक था | इसी बहाने किन्नर समुदाय के साथ पहली बार मैंने काफी ज्यादा वक्त बिताया और इतने करीब से उनके जीवन को देखा | कई किन्नर उसमे शादी शुदा भी थी | अलग अलग दफ्तरों में काम करने वाली, कोचिंग इंस्टिट्यूट चलने वाली, पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक कर रही किन्नरों से कल मुलाकात हुई | जितना समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर रखा है वो लोग वैसे है ही नहीं, वो हम से अलग नहीं हम लोगों ने उन्हें अपने से अलग कर रखा है | जब मेरी बात कल उन लोगों से हुई तो कई ऐसी बातें सामने आई जिसने उन सारे मिथ्यायों को तोड़ दिया जो आज तक मेरे कान में समाज के द्वारा भरे गए थे | जब मैंने ये तय किया कि मैं उन लोगों पर एक न्यूज़ स्टोरी करूँगा तो कई लोगों ने कहा कि संभल के रहना कही तुम्हे भी वो लोग अपने तरह ना बना दे | आये दिन किन्नरों को इससे भी ख़राब बातों का सामना करना पड़ता है | जब कोई किन्नर ऑटो में बैठती है तो उसके बगल में बैठने वाले लोग उतर जाते है | या जब वो बसों में आरक्षित महिलाओं के सीट पर बैठती है तो कई बार महिलाएं ही उन्हें उठा देती है कि ये महिलाओं की सीट है हिजड़ो की नहीं | लेकिन इस मामले को लेकर बिहार में किन्नरों ने लड़ाई लड़ी और अपने लिए राज्य सरकार से आरक्षित बस सीटों का इंतज़ाम करवाया | जब वो अपने कॉलेज जाते है पढाई करने तो उनका कोई दोस्त नहीं बनता, उनके पास कोई बैठना नहीं चाहता, उन्हें लोग ताली बजा के चिढाते है | यही कारण है कि कई ऐसे किन्नर भी है जो अपनी आइडेंटिटी को छुपा कर रखते है | इससे ख़राब बात क्या होगी कि हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि कोई इंसान अपनी पहचान से इतना शर्मिंदा है कि वो अपने पहचान को छिपा कर रखता है | अगर आप लोगों ने ध्यान दिया होगा तो बड़े बड़े दफ्तरों के पदों पर जब नौकरी के आवेदन निकलते है तो उसमे सेक्स यानी लिंग में सिर्फ महिला या पुरुष ही रहते है | सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया है कि सारे फॉर्म्स में तीसरे लिंग का भी खाना रहे | लेकिन सरकारी फॉर्म्स में भी तीसरे लिंग का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है | जब आप रेल टिकट का आवेदन पत्र देखेंगे तो उसमे भी महिला या पुरुष का ही खाना रहता है | तो क्या ये माना जाये कि सरकार भी उन्हें इंसान या अपने सिटीजन के तौर पर नहीं मानती है ?

Friday, 7 October 2016


क्या दलित और अल्पसंख्यक आतंकवादी होते है ?
आये दिन ख़बरों में किसी ना किसी आतंकवादी या शक के बिनाह पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों का नाम छपता है | उन लोगों का नाम पढने के बाद एक ही सवाल मन में आता है , क्या सिर्फ दलित और अल्पसंख्यक ही आतंकवादी होते है ? या जो लोग दलित और अल्पसंख्यक होते है उन्ही पर आतंकवादी होने का शक किया जाता है | आज मेरी मुलाकत तारिक अनवर से हुई जो पटना यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता का छात्र है और साथ ही AISA का विश्वविद्यालय अध्यक्ष भी | तारिक भाई के साथ तीन और लोग जिनमे से दो से मेरी मुलाकात हुई है उनके नाम है आज़ाद चाँद और गौतम , ये दोनों भी जन अधिकार पार्टी के सदस्य है | ये चारों छात्र अल्पसंख्यक और दलित समुदाय से आते है और चारों को विश्विद्यालय प्रशासन ने निष्कासित किया है क्योंकि विश्विद्यालय को ये "शक" है कि ये छात्र आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है |इन चारों छात्रों को गुनाह सिर्फ ये था की उन्होंने अपने डिपार्टमेंट में हो रहे जातिगत दुर्वयवहार के खिलाफ आवाज़ उठाई और देखते ही देखते ये मुद्दा एक बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया | इस आन्दोलन में कई और छात्र हितों के मुद्दे जुड़े हुए थे , इस आन्दोलन से नाराज़ हिंदी और पत्रकारिता विभाग के हेड प्रोफेसर मटुक नाथ ने पटना विश्विद्यालय के कुलपति को चिट्ठी लिखी और इन छात्रों को सस्पेंड करने की मांग की साथ ही साथ ये भी लिखा की इन छात्रों से मेरी जान को खतरा है | इसके जवाब में विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन चार छात्रों को निष्कासित कर दिया | मज़े की बात ये है की विश्वविद्यालय को भी दलित और अल्पसंख्यक छात्रों से ही ज्यादा परेशानी और खतरा लगा | सिर्फ यही नहीं कई ऐसे केस है जिनमे लोगों को सिर्फ दलित और अल्पसंख्यक होने के कारण आतंकवादी का दंश झेलना पड़ रहा है | लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के आरोपी आज भी आज़ाद हवा में सांस ले रहे है , उनपर न सरकार की सख्ती दिखाई दी नाही पुलिस की | सिर्फ इस लिए कि वो दलित नहीं थे | सबसे अफ़सोस तब होता है जब देश के एक नामी संस्था जो काफी प्रगतिशील विचारधारा के है उसके एक सदस्य ने पूछा की "आमिर तुमको क्या लगता है की पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करना चाहिए ?" मेरा जवाब था "करने से पहले अच्छे से विचार करना चाहिए क्योंकि आतंकवादी देश घोषित करने के बाद वहां की आम जनता पर काफी दुष्प्रभाव पड़ेगा, उस जनता पर जो आतंकवादी नहीं है |" तब उस आदमी ने जवाब दिया "भाई अब आप पर भी पैनी नज़र रखनी पड़ेगी |" आज पुरे देश में धर्म को लेकर लोगों पर आतंकवाद से संबंध होने का शक किया जाता है , पर अब लोगों को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए | आज कई ऐसे लोग है जो अल्पसंख्यक या दलित समुदाय से आते हैं और उनके वजह से हिन्दुस्तान का नाम अलग अलग क्षेत्रों में बढ़ा है है | दलितों पर ऊँगली उठाने वालों को ये हमेशा याद रखना चाहिए कि इस देश का संविधान, जिस पर पूरा देश टिका हुआ है, वो भी एक दलित ने ही लिखा था | |

Wednesday, 28 September 2016


भगत सिंह और उनके विचार
आज भगत सिंह का 109वां जन्मदिन है | बल्कि ये कहना उचित रहेगा की आज भगत सिंह के विचारों का 109वां जन्मदिन है | आज सुबह से ही कारगिल चौक के सामने वाली भगत सिंह की मूर्ति के इर्द गिर्द जमावड़ा लगा हुआ है | राजनैतिक दल चाहे वो उनकी विचारधारा को मानता हो या ना मानता हो अपने फायदे के लिए उनको भुनाने की कोशिश करता है | लेकिन मेरा ये मानना है की भगत सिंह को आज के दिन याद करने का सबसे बेहतर तरीका है उनके विचारों को पढना और उसे समझने की कोशिश करना | आज के कई नौजवान ऐसे है जो भगत सिंह की जीवनी से सिर्फ इसलिए प्रेरित है क्योंकि उन लोगों को अजय देवगन की एक्टिंग the legend of bhagat singh में काफी अच्छी लगी | उन्हें आज ज़रुरत है उनके विचारों को जानने की | मेरे जानकारी में कई ऐसे मित्र है जिन्हें अगर पता चले की भगत सिंह नास्तिक थे और वो किसी धर्म को नहीं मानते थे तो शायद वो उन्हें भी देशद्रोही करार दे दे |भगत सिंह का तो ये मानना था कि "जो व्यक्ति भी विकास के लिए खड़ा है उसे हर एक रुढ़िवादी चीज़ की आलोचना करनी होगी उसमे अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी |" भगत सिंह ने हमेशा अपने जीवन में कट्टरपंथ, जातिवाद, धर्म को कटघरे में खड़ा रखा |मेरे लिए भगत सिंह सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे , भगत सिंह उस देश की स्थापना की कोशिश की जहाँ पर मज़हब के नाम पर लोगों को बांटा ना जाये , जहाँ किसी के भी विकास में इसलिए बाधा ना डाली जाये क्योंकि वो एक दलित है | सोच के और भी ज्यादा ताज्जुब होता है की ये सारे विचार एक २२-२३ साल के नौजवान के थे | अगर भगत सिंह इतने कम उम्र में शहीद ना होते तो शायद इस देश की स्थिति पूरी तरह से भिन्न होती | लेकिन अभी भी ये बदलाव मुमकिन है क्योंकि भगत सिंह शायद ही आज ना हो लेकिन उनके विचार आज भी है | आज बहुत सारे ऐसे भी संगठन है जो भगत सिंह जयंती पर धरना-प्रदर्शन की तैय्यारी में है उनसे गुजारिश है की धरना-प्रदर्शन से अच्छा है कि आप लोगों के पास भगत सिंह के विचार अलग अलग माध्यम चाहे वो गीत, गोष्ठियां, सभा, नाटक आदि से पहुंचाए, क्योंकि अगर एक बार आम जनता ने भगत सिंह के विचारों को समझ लिया तो "इन्कलाब" आ के रहेगा |

Saturday, 24 September 2016


कई बार कट्टरपंथी चाहे वो किसी भी मज़हब ,धर्म या सम्प्रदाय को मानने वाले हो उनकी एक समान आदत है दुसरे मज़हब को गाली देने की | मेरी परवरिश एक प्रगतिशील माहोल के घर में हुई | जिस स्कूल में मैं पढने जाता था वो स्कूल पूर्णत धार्मिकता से लैस था | वहां केवल धर्म की बातें बताई जाती थी | मेरी मजबूरी थी की उसी स्कूल में पढूं क्योंकि मेरी माँ उसी स्कूल में हॉस्टल वार्डन का काम करती थी | वहां भी यह आम बात थी कि दुसरे धर्म के बारे में अपशब्द कहना | कई बार मेरी बहस कई शिक्षकों और छात्रओं से इस बारे में हुई | जब मैं आठवीं में पहुंचा तो हमारे इस्लामिक के नये टीचर आये | उनका पहला क्लास था और मैं हमेशा की तरह इसी उम्मीद में की आते ही इस्लाम का गुण गान और दुसरे धर्म की बुराई करेंगे | उनका पहला सवाल सभी से था -" क्या आप सभी मुसलमान है ?" बच्चों ने एक आवाज़ में कहा - "बेशक" | सर ने फिर पूछा " सोच लो मतलब तुम लोगों ने इस्लाम पर अपने सारे पैगम्बरों पर खुदा की सारी किताबों पर ईमान लाया है ?" " जी हाँ सर "| "तो अब बताओ अब तक कितने पैगम्बर हुए ?" किसी ने हाथ उठा करा जवाब दिया " कम-ओ-बेश १ लाख ३४ हज़ार "| सर ने कहा - एक दम सही कितनो के नाम हम जानते है १०, 20, बहुत आलिम फ़ाज़िल है तो ५० | लेकिन बाकी के पैगम्बरों का क्या ? उनका ब्यौरा हमारे पास नहीं है | हमें उनके बारे में नहीं पता है | खुदा ने कहा कि मैंने हर जगह पैगम्बर भेजे , तो यक़ीनन पैगम्बर हिन्दुस्तान में भी आये होंगे | हमें तो उनका पता तो है नहीं | हो सकता है वो पैगम्बर गौतम बुद्ध हो, भगवान् राम या कृष्ण हो | क्योंकि उन लोगों ने भी वही काम किया जो खुदा के पैगम्बर , जिनका हम नाम जानते है , उन्होंने किया | अगर आप इन लोगों को या इनके मज़हब को गाली देते है तो यक़ीनन आप इस्लाम और उसके पैगम्बरों को गालिया रहे है | और उस सूरत-ए-हाल में आपको मुसलमान कहलाने का नाम नहीं है |" आज जब भी खबरों में या कहीं भी कोई भी किसी के धर्म को अपशब्द कहता है तब एक ही ख्याल मन में आता है की काश सारे लोग ना सही लेकिन अधिकतर लोगों की सोच वही हो जो उस टीचर की थी | - आमिर