Wednesday, 28 September 2016


भगत सिंह और उनके विचार
आज भगत सिंह का 109वां जन्मदिन है | बल्कि ये कहना उचित रहेगा की आज भगत सिंह के विचारों का 109वां जन्मदिन है | आज सुबह से ही कारगिल चौक के सामने वाली भगत सिंह की मूर्ति के इर्द गिर्द जमावड़ा लगा हुआ है | राजनैतिक दल चाहे वो उनकी विचारधारा को मानता हो या ना मानता हो अपने फायदे के लिए उनको भुनाने की कोशिश करता है | लेकिन मेरा ये मानना है की भगत सिंह को आज के दिन याद करने का सबसे बेहतर तरीका है उनके विचारों को पढना और उसे समझने की कोशिश करना | आज के कई नौजवान ऐसे है जो भगत सिंह की जीवनी से सिर्फ इसलिए प्रेरित है क्योंकि उन लोगों को अजय देवगन की एक्टिंग the legend of bhagat singh में काफी अच्छी लगी | उन्हें आज ज़रुरत है उनके विचारों को जानने की | मेरे जानकारी में कई ऐसे मित्र है जिन्हें अगर पता चले की भगत सिंह नास्तिक थे और वो किसी धर्म को नहीं मानते थे तो शायद वो उन्हें भी देशद्रोही करार दे दे |भगत सिंह का तो ये मानना था कि "जो व्यक्ति भी विकास के लिए खड़ा है उसे हर एक रुढ़िवादी चीज़ की आलोचना करनी होगी उसमे अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी |" भगत सिंह ने हमेशा अपने जीवन में कट्टरपंथ, जातिवाद, धर्म को कटघरे में खड़ा रखा |मेरे लिए भगत सिंह सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे , भगत सिंह उस देश की स्थापना की कोशिश की जहाँ पर मज़हब के नाम पर लोगों को बांटा ना जाये , जहाँ किसी के भी विकास में इसलिए बाधा ना डाली जाये क्योंकि वो एक दलित है | सोच के और भी ज्यादा ताज्जुब होता है की ये सारे विचार एक २२-२३ साल के नौजवान के थे | अगर भगत सिंह इतने कम उम्र में शहीद ना होते तो शायद इस देश की स्थिति पूरी तरह से भिन्न होती | लेकिन अभी भी ये बदलाव मुमकिन है क्योंकि भगत सिंह शायद ही आज ना हो लेकिन उनके विचार आज भी है | आज बहुत सारे ऐसे भी संगठन है जो भगत सिंह जयंती पर धरना-प्रदर्शन की तैय्यारी में है उनसे गुजारिश है की धरना-प्रदर्शन से अच्छा है कि आप लोगों के पास भगत सिंह के विचार अलग अलग माध्यम चाहे वो गीत, गोष्ठियां, सभा, नाटक आदि से पहुंचाए, क्योंकि अगर एक बार आम जनता ने भगत सिंह के विचारों को समझ लिया तो "इन्कलाब" आ के रहेगा |

Saturday, 24 September 2016


कई बार कट्टरपंथी चाहे वो किसी भी मज़हब ,धर्म या सम्प्रदाय को मानने वाले हो उनकी एक समान आदत है दुसरे मज़हब को गाली देने की | मेरी परवरिश एक प्रगतिशील माहोल के घर में हुई | जिस स्कूल में मैं पढने जाता था वो स्कूल पूर्णत धार्मिकता से लैस था | वहां केवल धर्म की बातें बताई जाती थी | मेरी मजबूरी थी की उसी स्कूल में पढूं क्योंकि मेरी माँ उसी स्कूल में हॉस्टल वार्डन का काम करती थी | वहां भी यह आम बात थी कि दुसरे धर्म के बारे में अपशब्द कहना | कई बार मेरी बहस कई शिक्षकों और छात्रओं से इस बारे में हुई | जब मैं आठवीं में पहुंचा तो हमारे इस्लामिक के नये टीचर आये | उनका पहला क्लास था और मैं हमेशा की तरह इसी उम्मीद में की आते ही इस्लाम का गुण गान और दुसरे धर्म की बुराई करेंगे | उनका पहला सवाल सभी से था -" क्या आप सभी मुसलमान है ?" बच्चों ने एक आवाज़ में कहा - "बेशक" | सर ने फिर पूछा " सोच लो मतलब तुम लोगों ने इस्लाम पर अपने सारे पैगम्बरों पर खुदा की सारी किताबों पर ईमान लाया है ?" " जी हाँ सर "| "तो अब बताओ अब तक कितने पैगम्बर हुए ?" किसी ने हाथ उठा करा जवाब दिया " कम-ओ-बेश १ लाख ३४ हज़ार "| सर ने कहा - एक दम सही कितनो के नाम हम जानते है १०, 20, बहुत आलिम फ़ाज़िल है तो ५० | लेकिन बाकी के पैगम्बरों का क्या ? उनका ब्यौरा हमारे पास नहीं है | हमें उनके बारे में नहीं पता है | खुदा ने कहा कि मैंने हर जगह पैगम्बर भेजे , तो यक़ीनन पैगम्बर हिन्दुस्तान में भी आये होंगे | हमें तो उनका पता तो है नहीं | हो सकता है वो पैगम्बर गौतम बुद्ध हो, भगवान् राम या कृष्ण हो | क्योंकि उन लोगों ने भी वही काम किया जो खुदा के पैगम्बर , जिनका हम नाम जानते है , उन्होंने किया | अगर आप इन लोगों को या इनके मज़हब को गाली देते है तो यक़ीनन आप इस्लाम और उसके पैगम्बरों को गालिया रहे है | और उस सूरत-ए-हाल में आपको मुसलमान कहलाने का नाम नहीं है |" आज जब भी खबरों में या कहीं भी कोई भी किसी के धर्म को अपशब्द कहता है तब एक ही ख्याल मन में आता है की काश सारे लोग ना सही लेकिन अधिकतर लोगों की सोच वही हो जो उस टीचर की थी | - आमिर